उद्देश्य :

विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन पर आधारित नवपरिवर्तन द्वारा खादी एवं वस्त्र विभाग की समस्याओं को समझना एवं उनमें सुधार करना |
खादी विभाग के संक्रियात्मक उद्देश्य:-
1) खादी से संबंधित संस्थानों में नाभिकेंद्र के रूप में जालतंत्र (नेटवर्क) तैयार करना |
2) विकेंद्रीकृत विभिन्न खादीप्रक्रिया के लिए सुयोग्य मशीनों को विकसित करना |
3) उत्पाद-संरचना तथा विकास हेतु अतिरिक्त मूल्यवर्धन को लेकर परामर्श देना ताकि खादी के बाजार में वृद्धि हो |
4) खादी क्षेत्र में गुणवत्ता-मानदंड, गुणवत्ता परीक्षण जालतंत्र (नेटवर्क) एवं गुणवत्ता-परामर्श पद्धतियों में बढ़ोतरी कर, प्रौद्योगिकी का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है ताकि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करने योग्य नमूने तैयार किए जा सके |

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सुविधाएँ:

एमगिरि में गुणवत्तापूर्ण अच्छे साधनों से परिपूर्ण प्रयोगशाला है जिसमें सूती रेशा से कपड़ा तक के मोजमाप करने हेतु दो दर्जन से अधिक परीक्षण करने के उपकरण उपलब्ध हैं | ऊनी रेशा और धागा से संबंधित परीक्षण उपकरण भी उपलब्ध हैं |

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अन्य सुविधाओं के अंतर्गत:-

मिनी सेंट्रल स्लाईंवर प्लान्ट, सौर चरखा वर्कशेड (डॉबी/जॅक्वॉर्ड) सेमी ऑटोमेटिक लूम, ऑटोमेटिक रैपियर लूम, हाथ फ्लैट बुनाई मशीन, CATD सुविधाएं, शिल्पकला, हैक डाइंग एम/सी, स्टेन रिमोव्हिंग यूनिट, कैलेंडरींग एम/सी, वाटर सोफ्टनिंग प्लांट, जिगर डाइंग एम/सी, 2 बाउल पैडींग मैंगल, प्रिंटिंग मशीन, सिल्क रिलीग मशीन, ऊन कटाई मशीन, विभिन्न प्रकार के चरखा टिवस्ट चरखा, मोटी सूत कटाई चरखा, फर सूत उत्पादक चरखा, स्लव सूत उत्पादक चरखा आदि |

व्यवहृत प्रौद्योगिकी :-

चरखे का कार्यसाधक प्रबंध एवं सौर चरखे के अनुसार प्रभावशाली बदलाव |
लच्छों की अधिक बहुमुखी संरचना एवं निर्माण और मशीनों की वस्त्र व्यापारिक प्रक्रिया |
कपास के अलावा उत्कृष्ठ ऊन की पूर्व कताई को संक्रियात्मक बनाने हेतु तकनीकी का विकास |
बाजार के झुकाव के अनुरूप बुने हुये खादी-वस्त्र की बनावट व परिधान की संरचना एवं विकास | खादी क्षेत्र के लिए बुनाई-तकनीकी का विस्तार और खादी क्षेत्र में फैन्सी व मिश्रित सूट का प्रारंभ तथा शिल्प शाला के नमूनों का पुनर्निर्माण | एमगिरि के विस्तारित शिल्प शाला में पूर्व ही 200 से अधिक डिझाइन बनाये गए हैं और अब वैबसाइट द्वारा इसका प्रचार-प्रसार हो रहा है | प्राकृतिक रंग और पर्यावरण-हितैषी रसायनों को प्राधान्यता देते हुए कपास, ऊन व रेशम खादी को सुसज्जित करना तथा खादी को सुखाने की तकनिकों का विकास करना |

पूर्ण सामर्थ्य से प्रौद्योगिकी का संपूरन :

सौर सूट के लिए उपयुक्त वस्त्र तकनीकों के पहलुओं के साथ एमगिरि द्वारा आविष्कृत सौर चरखे का अवलंबन:

सस्ते परिधानों के लिए सोलर फैब मार्ट |
मोजा-बनियान जैसे उत्पादों पर आधारित सौर सूत |

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मुलायम एवं कडक सज्जित तकनीक को श्री क्षेत्रीय गाँधी आश्रम, बाराबंकी उत्तर प्रदेश मे स्थानांतरित किया गया था, जो वर्तमान में प्रचलित ‘वाणिज्यिक सामान्य सुविधा केंद्र’ (सीसीएफसी) के नाम से स्थापित की गई है, जिसका प्रारंभ ‘खादी ग्रामोद्योग आयोग’ (KVIC) के संयुक्त तत्वावधान में एमगिरि के भूतपूर्व सलाहकार डॉ. आर. बी. चव्हाण, आय.आय.टी. दिल्ली द्वारा किया गया था |

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सोलर चरखा समूह

डॉ आर. वी. चव्हाण के सहयोग से हिंदी एवं अंग्रेजी में गुणवत्ता मानक पुस्तिका बनाई गई जिसे की KVIC के सारे खादी संस्थानो मे समावेश की गई ।

अतिरिक्त जानकारी:-

देश में ग्रामीण औद्योगीकरण की प्रक्रिया को बढ़ाने एवं गांधीजी के विचारों को साकार करने के लिए विज्ञान एवं तकनीकी की सहायता से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने एवं जीवन स्तर में सुधार करने के लिए भारत सरकार ने सूक्ष्म,लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय,नई दिल्ली भारत सरकार की सहायता से महात्मा गांधी ग्रामीण औद्योगीकरण संस्थान, महाराष्ट्र राज्य के वर्धा जिले में स्थापित किया है। सूक्ष्म,लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय का यह संस्थान खादी एवं वस्त्र,जैव प्रसंस्करण एवं जड़ी-बूटी,रसायन उद्योग,शिल्पकला एवं अभियांत्रिकी,ऊर्जा एवं अवसंरचना और प्रबंधन एवं व्यवस्थापन के क्षेत्र में अग्रणी कार्य कर रहा है। इन विभागों का मुख्य् ध्येय नई तकनीकी का विकास करना, उनका हस्तांतरण करना, गुणवत्ता निर्धारण, कच्चे माल का मूल्यवर्धन एवं विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी सहायता प्रदान करना है।

परियोजनाएँ (Projects):-

एमगिरि के खादी एवं वस्त्र विभाग द्वारा अनुसंधान एवं विकास के अंतर्गत तीन परियोजनाओं का कार्य जारी है। प्रत्येक परियोजना की कालावधि दो वर्ष की है।

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तीन परियोजनाओं के शीर्षक हैं:-

खादी ग्रामोद्योग (KVI) के क्षेत्र में प्रयुक्त विद्यमान औजारों व उपकरणों में सुधार (चरखा सुधारात्मक कार्य)।
मलमल खादी – परंपरागत निर्माण की प्रौद्योगिकी के पुनरूत्थान हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियाँ ।
एमगिरि कौशल विकास केंद्र – परंपरागत पद्धतियों के पुनरुत्थान तथा आधुनिक नवीनतम प्रौद्योगिकी के प्रयोग हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित गतिविधियाँ। उपरोक्त तीनों परियोजनाओं के लिए क्रमश: 21,500 लाख, 19,590 लाख एवं 36.33 लाख ऐसी कुल मिलाकर 77.42 लाख की निधि खादी ग्रामोद्योग आयोग द्वारा दी गई है।

एमगिरि द्वारा संचालित तीनों परियोजनाओं के उद्देश्य हैं:-

NMC चरखे पर कम कठिन परिश्रम द्वारा अधिकतम उत्पादकता बढ़ाने हेतु प्रौद्योगिकी को विकसित करना।
प्रौद्योगिकी के प्रचार–प्रसार हेतु प्रौद्योगिकी प्रचार-प्रसार कार्यशालाओं का संचालन करना।
खादी क्षेत्र में रोजगार निर्मित करने के लिए प्रौद्योगिकी का अंतरण करना।

एमगिरि का कार्य-दायित्व:-

कार्यक्रम, उत्पा्द, प्रक्रिया, आदर्श नमूने, प्रणाली आदि के प्रति जागरूकता निर्माण करना।
जिन भागों में इसकी आवश्यकता है, ऐसे भागों की पहचान करना।
नवीन उत्पादनों एवं प्रौद्योगिकी के लिए नवीनतम कल्पनाओं की पूर्ति करना।

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